गीता को पढ़ने वाले अक्सर उसके कर्म पर संदेश खोजते हैं। इसीलिए "Bhagavad Gita quotes on karma in Hindi" खोजा जाता है। हम यहाँ श्लोकों का पूरा पाठ नहीं दोहरा रहे, बल्कि अध्याय और श्लोक संख्या देकर उनका भावार्थ अपने शब्दों में लिख रहे हैं, ताकि आप मूल ग्रंथ में जाकर पढ़ सकें।
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कर्म का अधिकार, फल का नहीं (2.47)
अध्याय 2 के 47वें श्लोक का सार यह है कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर नहीं। फल की चिंता में डूबकर कर्म करने से मन बेचैन होता है। इसलिए फल को अपेक्षा बनाने के बजाय अपना कर्तव्य पूरी ईमानदारी से करना चाहिए। साथ ही यह भी कहा गया है कि कर्म न करने में भी आसक्ति न रखें।
कोई कर्म के बिना नहीं रहता (3.5)
तीसरे अध्याय का पाँचवाँ श्लोक कहता है कि कोई भी व्यक्ति क्षणभर भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता, क्योंकि प्रकृति के गुण उसे कर्म करने को बाध्य करते हैं। यानी निष्क्रियता भी एक तरह का कर्म ही है। इसलिए सवाल कर्म करने या न करने का नहीं, बल्कि सही कर्म चुनने का है।
आसक्ति के बिना कर्तव्य (3.19)
तीसरे अध्याय में कहा गया है कि आसक्ति छोड़कर अपना कर्तव्य करने वाला व्यक्ति परम स्थिति को पाता है। यहाँ आसक्ति का मतलब है नतीजे से चिपक जाना। नौकरी, पढ़ाई या घर का काम, हर जगह यही सीख है कि मेहनत पूरी करें और नतीजे को अपनी बेचैनी न बनने दें।
कर्म में अकर्म, अकर्म में कर्म (4.18)
चौथे अध्याय का यह संदेश थोड़ा गहरा है। इसका भाव है कि जो व्यक्ति कर्म में भी निर्लिप्त रहता है और बाहर से निष्क्रिय दिखने पर भी भीतर से सजग रहता है, वह बुद्धिमान है। आम जीवन में इसे ऐसे समझ सकते हैं कि काम में डूबे रहते हुए भी अहंकार न पालें।
जीवन में कैसे अपनाएँ
- रोज़ का एक काम पूरी लगन से करें और नतीजे की चिंता कुछ देर छोड़ें।
- असफलता को कर्म की कमी नहीं, अनुभव की तरह लें।
- दूसरों से तुलना करने के बजाय अपने कर्तव्य पर ध्यान दें।
- काम को सेवा की तरह देखें, तो थकान कम लगती है।
- सफलता पर अहंकार और असफलता पर निराशा दोनों से बचें।
गलत समझ से बचें
'फल की चिंता मत करो' का मतलब यह नहीं कि लक्ष्य न रखें या योजना न बनाएँ। लक्ष्य रखना और उसके लिए प्रयास करना ही कर्म है। अपेक्षा की जकड़न छोड़ने की बात की गई है, लक्ष्य की नहीं। गीता कर्तव्य से पलायन की नहीं, कर्तव्य में संतुलन की सीख देती है।
गीता से और कर्म की सीख
गीता के तीसरे अध्याय को कर्मयोग कहा जाता है, जिसमें यज्ञ यानी सेवा-भाव से किए गए कर्म की बात है। इसका सार है कि जो कर्म दूसरों के हित में किया जाए, वह बंधन नहीं बनता। इसी वजह से कर्मयोग को सेवा और समर्पण से जोड़ा जाता है।
पढ़ने की आदत
रोज़ गीता का एक श्लोक अर्थ सहित पढ़ने की आदत डालें। शुरुआत में पूरे अध्याय के बजाय छोटे हिस्से से करें। परिवार के साथ बैठकर चर्चा करने से भी समझ गहरी होती है।
मूल पाठ कहाँ से पढ़ें
गीता का शुद्ध मूल पाठ और टीका गीता प्रेस, इस्कॉन या किसी जाने-माने प्रकाशन से लेना अच्छा रहता है। इन्हीं में श्लोक की टीका अलग-अलग दृष्टिकोण से मिलती है। इस लेख में दिए श्लोक संख्या को वहाँ खोलकर मूल श्लोक पढ़ सकते हैं।